अनुसूची 9 क्या हैं और इतनी चर्चा मे क्यु हैं
क्या है 9वीअनुसूची?
➤1951 मे केंद्र सरकार ने सविधान मे संशोधन करके 9 वी अनुसूची का प्रावधान किया था ताकि उसके द्वारा किये जाने वाले भूमि सुधारों को चुनोती न दी जा सके
➤ उस समय जब सरकार द्वारा शुरू किये गए भूमि सुधारों को बिहार ,मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की अदालतों में चुनोती दी गई थी जिसमे से बिहार मे इस कानून को अवेध ठहराया गया
➤ इस विषम परिस्थितियों से बचने के लिए और सुधारों को जारी रखने के लिए सरकार ने सविधान मै यह अनुसूची प्रथम सविधान संशोधन के अधिनिय, 1951 के तहत जोड़ी थी
➤ इस विषम परिस्थितियों से बचने के लिए और सुधारों को जारी रखने के लिए सरकार ने सविधान मै यह अनुसूची प्रथम सविधान संशोधन के अधिनिय, 1951 के तहत जोड़ी थी
इस अनुसूची मे यह पेच हैं?
➤पहले यह मन्यता थी की 9वी अनुसूची मे समिलित कानूनों को न्यायिक समीक्षा या उन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती लेकिन 11 जनवरी 2007 के संविधान पीठ के एक निर्णय द्वारा यह स्थापित किया गया कि 9वीं अनुसूची में सम्मिलित किसी भी कानून को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
➤पहले यह मन्यता थी की 9वी अनुसूची मे समिलित कानूनों को न्यायिक समीक्षा या उन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती लेकिन 11 जनवरी 2007 के संविधान पीठ के एक निर्णय द्वारा यह स्थापित किया गया कि 9वीं अनुसूची में सम्मिलित किसी भी कानून को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
बिल की यह है सबसे बड़ी कमजोरी?
➤केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए जो आरक्षण की सीमा 10 फीसदी रखी है उससे आरक्षण 60 फीसदी तक हो जाएगा जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को एक तरह से चुनौती है। बिल की यही खामी इसे सुप्रीम कोर्ट में कमजोर करेगी।
अनुसूची 9वी चर्चा मै क्यों है?
➤हाल ही मै सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण संबंधित मामलों मै अनुच्छेद -32 के तहत दायर याचिका पर कारवाही करने से इंकार करते हुए स्पष्ट किया है कि 'आरक्षण एक मौलिक अधिकार है नही है' सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के साथ ही आरक्षण संबंधी कारणों को 9वी अनुसूची मै शामिल करने की मांग एक बार पुन: चर्चा मे आ गया है
➤हाल ही मै सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण संबंधित मामलों मै अनुच्छेद -32 के तहत दायर याचिका पर कारवाही करने से इंकार करते हुए स्पष्ट किया है कि 'आरक्षण एक मौलिक अधिकार है नही है' सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के साथ ही आरक्षण संबंधी कारणों को 9वी अनुसूची मै शामिल करने की मांग एक बार पुन: चर्चा मे आ गया है
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
➤गिरफ्तार करने की शक्ति आपराधिक दंड संहिता (सीआरपीसी) से आती है, एससी/एसटी कानून से नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने केवल इस प्रक्रियात्मक कानून की व्याख्या की है, एससी/एसटी एक्ट की नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने कहा कि वह इस एक्ट के खिलाफ नहीं है, लेकिन निर्दोषों को सज़ा नहीं मिलनी चाहिये।
➤निर्दोष व्यक्तियों को इस कानून के प्रावधानों से आतंकित नहीं किया जा सकता और किसी भी व्यक्ति को उसके जीने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस कानून या इस पर अमल के विरुद्ध नहीं है।
➤उल्लेखनीय है कि एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च को दिये गए फैसले के संदर्भ में केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। केंद्र सरकार ने अपनी पुनर्विचार याचिका में कहा कि निर्णय में इस कानून के प्रावधानों को शिथिल करने के दूरगामी परिणाम होंगे। इससे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा तथा यह फैसला एससी-एसटी एक्ट, 1989 में परिलक्षित संसद की विधायी नीति के भी विपरीत है।
इस फैसले में एससी/एसटी एक्ट, 1989 के तहत किसी भी तरह के अपराध के मामले में निम्नलिखित नए दिशा-निर्देश जारी किये गए:
न्यायालय द्वारा जारी किये गए नए दिशा-निर्देश-
ऐसे मामलों में किसी भी निर्दोष को कानूनी प्रताड़ना से बचाने के लिये कोई भी शिकायत मिलने पर तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी।
- 1.सबसे पहले शिकायत की जाँच डीएसपी स्तर के पुलिस अफसर द्वारा की जाएगी।
- 2.यह जाँच पूर्ण रूप से समयबद्ध होनी चाहिये और किसी भी स्थिति में 7 दिन से अधिक समय तक न चले।
- 3.इन नियमों का पालन न करने की स्थिति में पुलिस पर अनुशासनात्मक एवं न्यायालय की अवमानना करने के संदर्भ में कार्रवाई की जाएगी।
- 4.अभियुक्त की तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।
- 5.सरकारी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाले उच्चाधिकारी की लिखित स्वीकृति के बाद ही गिरफ्तारी हो सकती है।
- 6.अन्य लोगों को ज़िले के एसएसपी की लिखित मंज़ूरी के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा।
- Comments करे और अपनी राय दे जय हिंद जय भारत 🇮🇳🇮🇳
➤गिरफ्तार करने की शक्ति आपराधिक दंड संहिता (सीआरपीसी) से आती है, एससी/एसटी कानून से नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने केवल इस प्रक्रियात्मक कानून की व्याख्या की है, एससी/एसटी एक्ट की नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने कहा कि वह इस एक्ट के खिलाफ नहीं है, लेकिन निर्दोषों को सज़ा नहीं मिलनी चाहिये।
➤निर्दोष व्यक्तियों को इस कानून के प्रावधानों से आतंकित नहीं किया जा सकता और किसी भी व्यक्ति को उसके जीने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस कानून या इस पर अमल के विरुद्ध नहीं है।
➤उल्लेखनीय है कि एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च को दिये गए फैसले के संदर्भ में केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। केंद्र सरकार ने अपनी पुनर्विचार याचिका में कहा कि निर्णय में इस कानून के प्रावधानों को शिथिल करने के दूरगामी परिणाम होंगे। इससे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा तथा यह फैसला एससी-एसटी एक्ट, 1989 में परिलक्षित संसद की विधायी नीति के भी विपरीत है।
इस फैसले में एससी/एसटी एक्ट, 1989 के तहत किसी भी तरह के अपराध के मामले में निम्नलिखित नए दिशा-निर्देश जारी किये गए:
न्यायालय द्वारा जारी किये गए नए दिशा-निर्देश-
ऐसे मामलों में किसी भी निर्दोष को कानूनी प्रताड़ना से बचाने के लिये कोई भी शिकायत मिलने पर तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी।
ऐसे मामलों में किसी भी निर्दोष को कानूनी प्रताड़ना से बचाने के लिये कोई भी शिकायत मिलने पर तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी।
- 1.सबसे पहले शिकायत की जाँच डीएसपी स्तर के पुलिस अफसर द्वारा की जाएगी।
- 2.यह जाँच पूर्ण रूप से समयबद्ध होनी चाहिये और किसी भी स्थिति में 7 दिन से अधिक समय तक न चले।
- 3.इन नियमों का पालन न करने की स्थिति में पुलिस पर अनुशासनात्मक एवं न्यायालय की अवमानना करने के संदर्भ में कार्रवाई की जाएगी।
- 4.अभियुक्त की तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।
- 5.सरकारी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाले उच्चाधिकारी की लिखित स्वीकृति के बाद ही गिरफ्तारी हो सकती है।
- 6.अन्य लोगों को ज़िले के एसएसपी की लिखित मंज़ूरी के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा।
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